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हारे हुए की शक्ल नहीं होती

इज्ज़त का शिकार हूं मैं  वक्त का गुलाम हूं मैं  पैगाम तो कई आए उस पार से पर शराफत का नकाब हूं मैं। मिलना हो अगर तो मिलेंगे किसी रोज़ मिलना हो ही ना कभी तो ना होगा अफसोस  रोज़ रोज़ मिलने को ना अब बेताब हूं मैं।  हारे हुए की शक्ल नहीं होती  बदनाम कभी अक्ल नहीं होती  शक्ल और अक्ल इन दोनों से भी रिश्ता कई बार खो चुका हूं मैं।  करने को करते हैं हम शायरी  दरजे के हम नहीं लाज़मी लफ्ज़ निकलते हैं सो लिखते हैं हम फटे हुए कागज़ पे भीगी हुईं स्याही हूं मैं।

रुक जा जरा

रुक जा जरा देख तो ले एक पल! कैसे खडे है राह मे एकसाथ होकर भी न मिलकर। किसी का रंग अलग किसी का रूप अलग कही कद अलग कही घेर अलग। किसी की बाँहें आसमान को चूमती  किसी की हवा संग झूलती  मगर जड़ें सबकी जमीन पे ही रेंगती। जैसे कोई जाल रोकना चाहें किसी धारा को  जो अाज तक किसीके लिए न रुकी। काट रहे उस तूफान को जिसने आज तक न जाने काटे है कितनें परवत। छान रहे उस सूरज को जिसने जला कर राख कर दिया न जाने कितनों को।  यह हैं जंगल!  सदियों से रहा धीट  प्रतीक अनेकता मे एकता का भिन्नता मे छुपी सुंदरता का। कह रहा है तुझसे ऐ इनसान   रुक जा जरा एक पल  देख तो ले! जिंदगी दौड़ मे नहीं  उस थमें हुए पल मे मिलती है  कलियां तेरे सीने पर लटकी माला मे नहीं  मेरी रगों मे झूलती डाल पे खीलती है जरा देख तो ले!